बाल मजदूर की आजादी
प्रभात कुमार रॉय
हमारे देश को करोड़ों बच्चों के बापू महात्मा गांधी और
चाचा नेहरु का देश क़रार दिया जाता हैं। फिर भी इस देश के लाखों करोड़ों बच्चे
आज़ादी के साठ साल बाद भी गुलाम
मजदूर की तरह कहीं किसी घर में
किसी कल कारखाने में अथवा किसी
होटल डाबे पर अपनी जिंदगीं को
तबाह ओ बरबाद कर रहे हैं। खतरनाक समझे जाने वाले कारखानों में बच्चों की मजदूरी
को एकदम गैरकानूनी करार दिए जाने
के बावजूद भी उनमें आज भी बहुत बड़ी संख्या में करोड़ों
बच्चे कार्यरत हैं। एक नया सरकारी फरमान जारी हो गया है कि घरेलू बाल मजदूर आजाद कर
दिए जाएगें। क्या हुकूमत ए हिंदुस्तान के पास इतनी कूव्वत है कि वह इन मासूमों को
वास्तव में एक नई जिंदगी अता कर सके। सरकार फरमाती है कि भारत देश में केवल
तीन करोड़ बच्चे मजदूरी करते हैं । जबकि बच्चों के सवालों पर काम करने वाली
गैर सरकारी संस्थाएं बताती हैं कि ये आंकडा तो तकरीबन दोगुना है। भारत माता के जो
बच्चे अभी तक स्कूलों में नहीं जाते हैं,
उनकी तादाद सरकार के अनुसार लगभग दो करोड़ है, जबकि गैर
सरकारी आंकडों के मुताबिक इनकी संख्या है तकरीबन पाँच करोड़
है। आंकडों के जाल में ज्यादा उलझा न जाए तो भी एक तथ्य तो
पुख्ता तौर पर सामने आता है कि चाचा नेहरु और बापू गांधी के सपनों को पूरा करने में
हमारा देश और देश की तमाम सरकारें एकदम नाक़ाम साबित हुई।
देश की जंगे ए आजादी
में क्रान्तिकारियों जिस आज़ाद भारत का स्वपन देखा था उसका
साकार होना तो अभी शेष है। देश इस साल स्वतंत्रता की 64
वीं सालगिरह मना रहा है। साथ ही साथ शहीद भगतसिंह और चंद्रषेखर आजाद की शहादत का
75
वां साल भी मना रहा है। ऐसे ऐतिहासिक साल में
देश जंगे आजादी योद्धाओं के कम से कम एक सपने को साकार करने संकल्प तो ले ही सकता
है कि देश का मुस्तकबिल और तक़दीर कहे जाने वाले सभी नौनिहालों को बाल मजदूरी के
अभिशाप से पूर्णत मुक्त कराके स्कूलों में दाखिल करा दिया जाए ।
शहीद ए आजम चंद्रशेखर आजाद और भगतसिंह और उनके सभी
क्रांतिकारी
साथियों ने एक आजाद समतामयी और ममतामयी समाजवादी
भारत निर्मित करने का लक्ष्य सामने रखा था। इस लक्ष्य के तहत भारत माता के सभी
नौनिहालों के लिए शिक्षा दीक्षा के समान अवसर फराहम करने की बात तो सदैव समाहित रही
है। दुर्भागयवश आजादी के चौसठ सालों के बाद भी हमारा देश
इस बुनियादी लक्ष्य से बहुत दूर प्रतीत हो रहा है। शिक्षा
को संवैधानिक तौर पर मौलिक अधिकार बना दिया गया है। क्या
वास्तव में इस लक्ष्य को हासिल होने के लिए देश कृतसंकल्प
हो सकेगा अथवा हम पहले की ही तरह देश के बच्चों के प्रश्नों पर महज खानापूरी करने
की नीति पर बाकायदा कायम रहेगें।
नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों में
विस्तारपूर्वक जाए तो ज्ञात हो जाएगा कि मासूम बच्चों
के साथ उनके मालिकान ने बहुत ही ज्यादा बेरहमी का व्यवहार किया करते हैं। उन्हे
बुरी तरह मारा पीटा जाता रहा और कुछ को तो सिगरेट और गर्म सलाखों से दागा गया था।
कालीन के कारखानों से लेकर घरों में कार्यरत बाल श्रमिकों की दास्तान खून और आंसूओं
में डूबी हुई है। नादान मासूम बच्चों के साथ अमानवीय बरताव करने के तथ्य तो इस देश
में एक आम बात रही है। बाल श्रमिक एक निहायत ही सस्ता श्रमिक है। बस एक ऐसा बेबस
मजदूर है, जोकि एक वयस्क मजदूर की
तुलना में एक चौथाई उजरत पर काम करता है। कदाचित यूनियन
बनाकर के मजदूरी बढाने की मांग भी
पेश नहीं कर सकता। सभी तरह के जुल्मों सितमों को
चुपचाप सहन किया करता है । जिसके काम की अवधि 18 घंटों तक बनी रहती है ।
बालश्रमिकों के बारे में बहुत से कानून अस्तीत्व में आए।
खतरनाक समझे जाने वाले सौ अघिक उद्योग घंघों में बाल श्रमिकों
के काम करने पर पाबंदी लगा दी गई। अन्य उद्योगों में बाल
श्रमिकों की मजदूरी की दैनिक अवधि
पांच घंटों तक सीमित कर दी गई। साथ ही साथ इनके मालिकान पर बच्चों की शिक्षा दीक्षा
की जिम्मेदारी भी आयद कर दी गई। बालश्रमिकों के हालात में
कोई बुनियादी अंतर कदाचित दिखाई नहीं दिया। बाल श्रमिक
कानून अभी तक तो एकदम बेअसर साबित हुए हैं। हर गली हर सड़क
हर मकाम पर बाल श्रमिक दिखाई देते हैं ।यहां तक कि खतरनाक करार दिए जाने वाले
उद्यागों में भी बहुत बड़ी तादाद में बच्चे कार्यरत हैं। बाल श्रम कानूनों का खुले
आम उल्लंघन होता है और अपराघियों को कोई सजा नहीं होती।
जिस कानून का कड़ाई से पालन नहीं होता उसका कोई अर्थ ही
नहीं रह जाता। कानूनी
दंड की खौफ ओ दहशत ही कानून की असल ताकत हुआ करती है। अभी तक का अनुभव है कि
बालश्रम कानून की कतई दहशत उसका उल्लंघन करने वालो को कदाचित नहीं है ।
अब एक नया सरकारी आदेश आया है जिसके तहत घरेलू बालश्रमिकों को
और होटल ढाबों पर काम करने वाले बच्चों को काम से आजादी मिलेगी। सवाल खड़ा होता है
कि ये सब आजाद हो जाएगें तो फिर जाएगें कहां। राजनीतिक इच्छा और शासकीय संकल्प के
आभाव में कहीं पहले की तरह यह नया सरकारी हुक्म भी कहीं एक मजाक बनकर ही न रह जाए ।
देश के सभी बच्चों के लिए उचित जगह विद्यालयों में हैं। लेकिन राजनितिक इच्छा शक्ति
के आभाव में अभी तक बहुत अधिक कुछ हो नहीं पाया है। नवोदय विद्यालयों की तर्ज पर
करोड़ों मेहनतकश बच्चों के लिए बड़े पैमाने पर आवासिय स्कूलों के निर्माण से संभवतया
इस समस्या का निदान मुमकिन हो सकेगा। बालश्रमिकों को उनके पुराने परिवेश से पूरी
तरह से अलग करके ही वस्तुतः उन्हें शिक्षित-दीक्षित किया जा सकता है। इस प्रश्न पर
अभी तक की सभी शासकीय योजनाओं की असफलता के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारण इनमें
व्याप्त बेइमानी और बदनीयती रही है। प्राइवेट और पब्लिक सैक्टर को संयुक्त तौर पर
एकजुट होकर बालश्रम के कलंक को जिसने समूचे विश्वभर में
भारत को शर्मिंदा किया है मिटाने का समुचित प्रयास करना होगा।